भाजपा को दिल्ली जीतने के लिए सिर्फ मोदी-शाह पर भरोसा, केजरीवाल के मुकाबले कोई नहीं
 

 

भाजपा के पास दिल्ली में ऐसा कोई कद्दावर चेहरा नहीं है जो आमने-सामने के मुकाबले में केजरीवाल को टक्कर दे सके। किसी को सीएम उम्मीदवार बनाए बिना ही प्रधानमंत्री मोदी के नाम पर चुनाव लड़ना ज्यादा बेहतर रणनीति होगी। 

महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में राज्य भाजपा नेताओं की विफलता के बाद दिल्ली विधानसभा चुनावों में भाजपा के केंद्रीय नेताओं को दिल्ली भाजपा में ऐसा कोई नेता नहीं दिखता जो मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को सीधी टक्कर दे सके। इसलिए भाजपा ने जीत की अपनी उम्मीद सिर्फ और सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और गृह मंत्री अमित शाह की रणनीति पर टिका दी है।
 

भाजपा के केंद्रीय नेताओं का मानना है कि जिस तरह दिल्ली में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पिछले पांच साल में अपनी जड़ें जमाई हैं उससे उनके सामने अब किसी नेता को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश करना सही रणनीति नहीं होगी। क्योंकि पार्टी के पास दिल्ली में ऐसा कोई कद्दावर चेहरा नहीं है जो आमने-सामने के मुकाबले में केजरीवाल को टक्कर दे सके। इसलिए अब किसी को सीएम पद का उम्मीदवार बनाए बिना प्रधानमंत्री मोदी के नाम पर ही चुनाव लड़ना ज्यादा बेहतर रणनीति होगी। पार्टी के एक कद्दावर नेता और केंद्रीय मंत्री के मुताबिक भाजपा 2015 जैसी गलती नहीं दोहराना चाहती जब पार्टी ने किरण बेदी को केजरीवाल के मुकाबले मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश किया था, लेकिन दिल्ली की जनता ने उसे खारिज कर दिया और भाजपा 31 से तीन सीटों पर सिमट गई थी।

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक, दिल्ली को लेकर केंद्रीय नेतृत्व ने एक बड़ी चूक ये की है कि 2015 में चुनाव में करारी हार के बावजूद कोई ठोस रणनीति नहीं बनाई गई और पार्टी को पूरी तरह प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी के भरोसे छोड़ दिया गया जबकि तिवारी न तो प्रदेश भाजपा के कार्यकर्ताओं का विश्वास जीत पाए और न ही पार्टी के जनाधार वर्ग में अपनी वो पकड़ बना पाए जो कभी भाजपा के पुराने और दिग्गज नेताओं मदनलाल खुराना, विजय कुमार मल्होत्रा, साहिब सिंह वर्मा जैसे नेताओं की होती थी। 

हालांकि अभी भी केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन और विजय गोयल भाजपा के ऐसे नेता हैं जिनकी दिल्ली भाजपा के पुराने कार्यकर्ताओं और पुराने जनाधार वर्ग (वैश्य और पंजाबी) पर पकड़ है, लेकिन इनकी भी सीमाएं हैं। एक वरिष्ठ भाजपा नेता के मुताबिक, डॉ. हर्षवर्धन की योग्यता, ईमानदारी, कर्मठता और प्रतिबद्धता असंदिग्ध है। लेकिन अब पांच सालों में दिल्ली का चरित्र काफी बदल चुका है, इसलिए उनकी भूमिका केंद्र सरकार के लिए ज्यादा ठीक है। जबकि विजय गोयल मेहनती हैं और उन्हें दिल्ली की समझ भी है, लेकिन केजरीवाल के मुकाबले वो उतने मजबूत नहीं हैं कि उन्हें टक्कर दे सकें। 

इसी तरह मनोज तिवारी, विजेंद्र गुप्ता, सतीश उपाध्याय आदि नेता अरविंद केजरीवाल का विकल्प अभी तक नहीं बन सके हैं। इसलिए बेहतर रणनीति प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता, उनके चेहरे और केंद्र सरकार की उपलब्धियों के आधार पर ही दिल्ली की जनता से जनादेश मांगने की है। भाजपा के एक अन्य बड़े नेता ने इससे सहमति जताते हुए कहा कि अगर पार्टी किसी एक नेता को दो तीन साल पहले से दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में पेश करने के लिए तैयार किया जाता तो आज भाजपा अरविंद केजरीवाल को न सिर्फ टक्कर दे रही होती, बल्कि मोदी की लोकप्रियता और शाह की रणनीति के बल पर भाजपा को शानदार बहुमत पाकर सरकार बनाती। लेकिन अब पार्टी को जीत के लिए एक-एक सीट पर कड़ा संघर्ष करना होगा। 

इस भाजपा नेता के मुताबिक, जहां तक दिल्ली भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी के नेतृत्व की बात है तो तिवारी ने अपने हिसाब से खासी मेहनत की है, लेकिन उनकी छवि एक गंभीर नेता की नहीं बन सकी जो केजरीवाल को चुनौती दे सके। दूसरा उन्होंने अपना सारा जोर पूर्वांचलियों पर ही लगाया जिसकी वजह से वह दिल्ली में भाजपा के मूल जनाधार पंजाबी और वैश्य मतदाताओं का वह भरोसा नहीं जीत सके हैं जो पुराने भाजपा नेताओं को मिलता था। इसलिए अब केंद्र की उपलब्धियों, मोदी की लोकप्रियता और शाह की रणनीति ही भाजपा का सबसे बड़ा चुनावी हथियार हैं जिनके सहारे पार्टी दिल्ली की लड़ाई जीतने की पूरी कोशिश करेगी।