केंद्र सरकार ने गजट नोटिफिकेशन जारी किया


शुक्रवार से देश भर में नागरिकता संशोधन कानून लागू हो गया। केंद्र सरकार ने 10 जनवरी को गजट नोटिफिकेशन (राजपत्र में प्रकाशन) के जरिए इस कानून के लागू होने की अधिसूचना जारी की। इसमें गृह मंत्रालय ने कहा, “केंद्र सरकार जनवरी, 2020 के 10 वें दिन को उस तारीख के तौर पर सूचित करती है, जिस दिन नागरिकता संशोधन अधिनियम के प्रावधान लागू होंगे।” राजपत्र में प्रकाशित होने पर ही किसी कानून को लागू करने की आधिकारिक घोषणा मानी जाती है।


नागरिकता संशोधन कानून क्या है? 
नागरिकता कानून 1955 में आया था। इसके तहत किसी भी व्यक्ति को भारतीय नागरिकता लेने के लिए कम से कम 11 साल भारत में रहना अनिवार्य है। भारत में अवैध तरीके से दाखिल होने वाले लोगों को नागरिकता नहीं मिल सकती है। उन्हें वापस उनके देश भेजने या हिरासत में रखने के प्रावधान हैं। संशोधित विधेयक में पड़ोसी देशों अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के अल्पसंख्यक शरणार्थियों (हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी और ईसाई) को नागरिकता मिलने का समय घटाकर 11 साल से 6 साल किया गया है। मुस्लिमों और अन्य देशों के नागरिकों के लिए यह अवधि 11 साल ही रहेगी।


 यह कानून 1955 में आया। इसके तहत भारत सरकार अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के गैर-मुस्लिमों (हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी और ईसाई) को 12 साल देश में रहने के बाद नागरिकता दे


संशोधित विधेयक में अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के अल्पसंख्यक शरणार्थियों को नागरिकता मिलने की समयावधि 6 साल करने का प्रावधान है। साथ ही 31 दिसंबर 2014 तक या उससे पहले आए गैर-मुस्लिमों को नागरिकता मिल सकेगी। इसके लिए किसी वैध दस्तावेज की जरूरत नहीं होगी।


पूर्वोत्तर के लोगों ने विरोध जताते हुए कहा कि नागरिकता बिल के लागू होने से राज्यों की सांस्कृतिक, भाषाई और पारंपरिक विरासत खत्म हो जाएगी।


इसमें 1971 से पहले आए लोगों को नागरिकता देने का प्रावधान था। सरकार ने साफ कर दिया है कि यह विधेयक असम तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह पूरे देश में प्रभावी होगा।


सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता के मुताबिक, एनआरसी का मुद्दा शरणार्थी बनाम घुसपैठिए का है। सरकार हिंदू, जैन, बौद्ध और ईसाई (गैर-मुस्लिमों) को शरणार्थी मानती है। तर्क यह है कि इन्हें अगर दूसरे देश में प्रताड़ित होकर ये भारत आते हैं तो उन्हें शरण दी जानी चाहिए। नागरिकता संशोधन विधेयक का दो आधार पर विरोध किया गया। पहला तर्क- इसमें संविधान के समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है, जिसके तहत धार्मिक आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। दूसरा तर्क- इसे करने से कई राज्यों में स्थानीय सांस्कृतिक और क्षेत्रीय संस्कृति को खतरा पहुंच सकता है।


पूर्वोत्तर समेत कई जगह विरोध हुआ


लोकसभा में बिल पास होने के बाद से ही पूर्वोत्तर समेत देशभर में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ हिंसक प्रदर्शन हुए। इस दौरान कई लोगों की जान गई। 2014 में मोदी के सत्ता संभालने के बाद से यह अब तक का सबसे बड़ा प्रदर्शन था।